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"चिथड़े" अरमानों के

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"चिथड़े" अरमानों के   एक बीमारी ने बहुतो को निगल लिया , लेकिन क्या बेमौत मारे जाने में  व्यवस्थायों ने भी थोड़ा बहुत साथ नहीं  दिया, वो व्यवस्था जिसके बारे में ये कहा जाता है की ये एक सौ तीस करोड़ लोगों के लिए है, और बहुत जरुरी है, हमने भी माना कि जरूरी तो है क्योंकि इस बीमारी से बचने का एक मात्र उपाय भी यही है , लेकिन क्या करे इस व्यवस्था में सबकी अवस्था एक जैसी तो नहीं, ( यहाँ व्यवस्थायों से मेरा मतलब लॉकडाउन से है ) कहीं तो एक तरफ कुछ लोग खूब सारे व्यंजन बना रहे है और सोशल मीडिया की शोभा बढ़ा रहे है तो कही मजबूर मजदूर  दो जून की रोटी को भी तरस गए है , लेकिन उनका क्या , किसे पड़ी , न उनके जान की कोई कीमत और न उनके जाने का किसी को ग़म , तभी तो रेल की पटरियों पर कमाई हुई रोटियाँ बिखर गयी और मेहनतकश शरीर चीथड़ों में बट गए ,   घर जाने की आस पर मालगाड़ी चल पड़ी पड़ी और शहर से गांव की तरफ जा रहे सपनों ने वही दम तोड़ दिया , पर किसी को क्या फर्क पड़ा , हाँ खबरों का अभी शोर है , कुछ दिन रहेगा फिर वो भी थम जायेगा , लोग भूल जायेंगे , और हमारे राजनेताओ को तो ...