"चिथड़े" अरमानों के




"चिथड़े" अरमानों के  



एक बीमारी ने बहुतो को निगल लिया , लेकिन क्या बेमौत मारे जाने में
 व्यवस्थायों ने भी थोड़ा बहुत साथ नहीं  दिया, वो व्यवस्था जिसके बारे में ये कहा जाता है की ये एक सौ तीस करोड़ लोगों के लिए है, और बहुत जरुरी है, हमने भी माना कि जरूरी तो है क्योंकि इस बीमारी से बचने का एक मात्र उपाय भी यही है , लेकिन क्या करे इस व्यवस्था में सबकी अवस्था एक जैसी तो नहीं, ( यहाँ व्यवस्थायों से मेरा मतलब लॉकडाउन से है ) कहीं तो एक तरफ कुछ लोग खूब सारे व्यंजन बना रहे है और सोशल मीडिया की शोभा बढ़ा रहे है तो कही मजबूर मजदूर  दो जून की रोटी को भी तरस गए है , लेकिन उनका क्या , किसे पड़ी , न उनके जान की कोई कीमत और न उनके जाने का किसी को ग़म , तभी तो रेल की पटरियों पर कमाई हुई रोटियाँ बिखर गयी और मेहनतकश शरीर चीथड़ों में बट गए , घर जाने की आस पर मालगाड़ी चल पड़ी पड़ी और शहर से गांव की तरफ जा रहे सपनों ने वही दम तोड़ दिया , पर किसी को क्या फर्क पड़ा , हाँ खबरों का अभी शोर है , कुछ दिन रहेगा फिर वो भी थम जायेगा , लोग भूल जायेंगे , और हमारे राजनेताओ को तो ऐसे हादसे भूलने में महारथ हासिल है , नहीं भूलेंगी तो वो इनके अपनों की पथराई आँखें जो गांव पर रह कर इंतज़ार करती रह गयी... वो बूढ़े माँ -बाप जिन्होंने अपने घर के चिराग को इस उम्मीद में शहर भेजा था की चार पैसा आये तो घर की गरीबी दूर हो जाएगी , वो पत्नी जो गांव पर बैठे -बैठे ये सोचती होगी की शहरों का दिल बहुत बड़ा होता है इसलिए उसके पति कभी खली हाथ नहीं आएंगे , कौन समझाए इन लोगों को जिस शहर को बसाने में , बनाने में इन मजदूरों का बड़ा हाथ होता है वो शहर इन्हे कभी नहीं अपनाता , इनका यहाँ न कोई ठौर - ठिकाना होता है और न ही कोई निश्चित आशियाना , सिर्फ चलते रहना ही इनकी किस्मत होती है , और ये किस्मत भी तब तक ही इनका साथ देती है जब तक ये चलते रहते है क्योंकि जब ये थक कर रुक जाते है तो इन पर बेरहम सिस्टम की मालगाड़ी चल पड़ती है और अरमानों , सपनों और आने वाले कल को चीथड़ों में बदल देती है और पल भर में सब ख़त्म हो जाता है, पर किसी को क्या 























टिप्पणियाँ

  1. यह मानव इतिहास की सबसे वीभत्स त्रासदियों में है। हम इसे रोक सकते थे।

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  2. यही जरुरी भी है क्योंकि मनुष्य की अपने कार्य के प्रति ईमानदारी ही उसकी मानवता के लिए सच्ची सेवा है

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