संदेश

"चिथड़े" अरमानों के

चित्र
"चिथड़े" अरमानों के   एक बीमारी ने बहुतो को निगल लिया , लेकिन क्या बेमौत मारे जाने में  व्यवस्थायों ने भी थोड़ा बहुत साथ नहीं  दिया, वो व्यवस्था जिसके बारे में ये कहा जाता है की ये एक सौ तीस करोड़ लोगों के लिए है, और बहुत जरुरी है, हमने भी माना कि जरूरी तो है क्योंकि इस बीमारी से बचने का एक मात्र उपाय भी यही है , लेकिन क्या करे इस व्यवस्था में सबकी अवस्था एक जैसी तो नहीं, ( यहाँ व्यवस्थायों से मेरा मतलब लॉकडाउन से है ) कहीं तो एक तरफ कुछ लोग खूब सारे व्यंजन बना रहे है और सोशल मीडिया की शोभा बढ़ा रहे है तो कही मजबूर मजदूर  दो जून की रोटी को भी तरस गए है , लेकिन उनका क्या , किसे पड़ी , न उनके जान की कोई कीमत और न उनके जाने का किसी को ग़म , तभी तो रेल की पटरियों पर कमाई हुई रोटियाँ बिखर गयी और मेहनतकश शरीर चीथड़ों में बट गए ,   घर जाने की आस पर मालगाड़ी चल पड़ी पड़ी और शहर से गांव की तरफ जा रहे सपनों ने वही दम तोड़ दिया , पर किसी को क्या फर्क पड़ा , हाँ खबरों का अभी शोर है , कुछ दिन रहेगा फिर वो भी थम जायेगा , लोग भूल जायेंगे , और हमारे राजनेताओ को तो ...

राजनीति vs राजधर्म

चित्र
राजनीति में कभी-कभी ऐसा समय आता है जब ये लगता है कि किसी राजनेता के लिए राजधर्म ज्यादा मायने रखता है या राजनीति, आज हमारे पास इसके दो उदाहरण या यूं कहे कि मुख्यमंत्री है जिनमें से एक ने राजधर्म को अहमियत दी तो दूसरे ने राजनीति को, सबसे पहले बात करेंगे सीएम योगी आदित्यनाथ की जिनके पिता के मृत्यू हो जाने पर भी वो राजधर्म नहीं भूले, पिता की मृत्यू का समाचार एक ऐसा समय होता है जो किसी भी पुत्र के लिए उसके भावनाओँ के सागर को तोड़ दे लेकिन सीएम ने इस समाचार को पाकर भी अपने कर्तव्य का वहन किया क्योंकि जब उनको ये समाचार मिला था तब वो कोरोना मालले पर टीम 11 के मीटिंग में व्यस्त थे , उन्होंने बिना विचलित हुए उस मीटिंग को पूरी किया फिर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पिता के लिए एक खत लिखा , जिसमें उन्होंने लिखा कि पिताजी के कैलाशवासी होने पर मुझे भारी दुख और शोक है. वे मेरे पूर्वाश्रम के जन्मदाता हैं. जीवन में ईमानदारी , कठोर परिश्रम और नि:स्वार्थ भाव से लोक मंगल के लिए समर्पित भाव के साथ कार्य करने का संस्कार बचपन में उन्होंने मुझे दिया. अंतिम क्षणों में उनके दर्शन की हार्दिक इच्...

मजबूर कौन ?

चित्र
जब बीमारी शहर को बेगाना कर देती है तब वही शहर जो कभी उम्मीदों की रौशनी बिखेरता था एक पल में बेबसी का रेगिस्तान बन जाता है, और कुछ ऐसी ही बेबसी इन दिनों दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर देखने को मिला जहाँ प्रवासी मजदूर काम न होने , पैसे न होने और माकन मालिकों द्वारा बेदखल किये जाने पर भगवान भरोसे ही सड़क पर निकल गए, पहले 10 फिर 100 और फिर हज़ारों की संख्या में इनका रेला दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर होता चला गया, लेकिन क्या इस समय देश में बेबसी का यही एक चेहरा है सच पूछिए तो नहीं , अगर एक चेहरा मजदूरों की बेबसी है तो दूसरा चेहरा सरकार की बेबसी का है क्योंकि सरकार ये जानती है की कोरोना जैसी  बीमारी को भारत जैसे देश में रोकने के लिए लॉकडाउन  बेहद जरुरी है क्योंकि अगर हमारे देश में कोरोना स्टेज 3 में पहुंचा तो इस बीमारी को कंट्रोल में लाना यहाँ बहुत मुश्किल हो जायेगा और यही सोच कर सरकार ने फ़ौरन लॉकडाउन का रास्ता अपनाया अब ये सरकार की बेबसी नहीं तो और क्या है.... अब ज़रा इस बात को भी समझाना होगा की हम इस लॉकडाउन से कोरोना की चेन को तोर सकते है लेकिन मजदूरों के इसी रेले ने लॉकडाउन ...

इंतज़ार

चित्र
इंतज़ार   मुझे , आपको , हम सबको उस सुबह का जब निर्भया के दोषियों को फांसी की सज़ा होगी और शायद तब बहुत कुछ बदल जायेगा , शायद ऐसी घटना को अंजाम देने से पहले अपराधी दस बार सोचेंगे , और शायद तब ऐसी घटनाये बहुत कम देखने को मिलेगी, इसलिए इंतज़ार है उस सुबह का जो  शायद  एक नई सुबह होगी, पर अगर ऐसा नहीं हुआ तो ऐसी घटनाये तभी बार बार होती रहे तो... क्योंकि निर्भया के अपराधियों को भले ही अब फांसी दी जाने वाली हो पर फांसी की सज़ा तो 2013 में ही हो गयी थी... तब से अब तक क्या कुछ बदला? नहीं, कम से कम आंकड़े तो यही कहते है, 'नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो'   की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर एक घंटे में 4 रेप की घटना होती है,अकेले राजधानी दिल्ली में हर दिन 6 महिलाएं  रेप और गैंगरेप की शिकार होती है और 9 महिलाएं छेड़छाड़ का शिकार होती है... वही आकड़ो के मुताबिक 2012 में रेप के 24923  मामले सामने आये इसी तरह 2013 में 33707 मामले 2014 में 35735 मामले , 2015 में 34210 मामले , 2016 में 38097 मामले , 2017 में 32559 मामले , 2018 में 33356 मामले , 2019 में...

निर्भया की चिट्ठी...

चित्र
निर्भया की चिट्ठी... मेरे जाने के बाद क्या बदला माँ दोषी पकड़े गए क्या उन्हें सजा हुई क्या जग मेरे उपर तो नहीं हंसा मेरे समय और कपड़े पर किसी ने कुछ कहा क्या तुम रोयीं तो क्या जग भी रोया माँ मेरे जाने के बाद क्या बदला माँ । मेरे जाने के बाद क्या बदला माँ अब तो हर लड़की सुरक्षित है न माँ रात का अंधेरा उन्हें डराता तो नहीं न जाने कब कौन आदमी के वेश में भेड़िया निकल जाए ये डर उन्हें सताता तो नहीं न्यायपालिका ने तेरी गुहार सुनी होगी फाँसी की सज़ा भी ज़रूर हुई होगी चुप क्यों है बता न माँ मेरे जाने के बाद क्या बदला । तेरी चुप्पी बताती है सड़क अब भी डरावनी है तेरी चुप्पी बताती है रातें अब भी डरावनी है तेरी चप्पी बताती है हालात अब भी डरावने है तेरी चुप्पी बताती है मैं अब भी हर रोज़ मरतीं हूँ तेरी चुप्पी बताती है मैं आज भी इंसाफ़ को तरसतीं हूँ तेरी चुप्पी बताती है ,मेरे जाने के बाद कुछ नहीं बदला माँ मेरे जाने के बाद कुछ नहीं बदला ।।

बेबसी

चित्र
अब हर ओर गूंजती सिसकिया है ,अपनों को ढूंढती नम नज़रे है , विध्वंश के बाद की दहशत है ,जल चुके आशियाने का दर्द है ,और इनसब के बीच एक बेबसी है, बेबसी एक माँ की जिसके सामने उसके जवान बेटे की हत्या हुई , बेबसी उन बच्चों की जो अपने आखों के सामने अनाथ हो गए, बेबसी उस पिता की जो अस्पताल में अपने बेटे की ज़िन्दगी के लिए मिन्नतें कर रहा है , बेबसी उस भाई की जो मोर्चरी के बहार आहे भर रहा है...इतना सब होने के बाद भी इसी राजधानी  दिल्ली में एक गलियारा एक दम सुरक्षित है और कमाल की बात तो ये है की इसी गलियारे से दंगे की ये आग भड़की थी, और वो गलियारा है सियासत का... हा लाँकि ये बेबसी कोई नई तो नहीं ये तो हमने पहले भी देखा है, तब दौर 2002 का था और राज्य गुजरात था,  तब करीब 2000 से ज्यादा लोगों की जान गयी थी जैसा की इस घटना के पीड़ितो ने बताया था, हाँ  सरकारी आकड़ें इससे अलग है क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक तो गुजरात दंगो में 1044 लोगों की मौत हुई थी जिसमें 790 मुस्लिम और 254 हिंन्दू थे, उस वक़्त भी ऐसी ही बेबसी थी, यही दहशत था ऐसे ही चीत्कारें थी, यही सिसकिया सालो...

'राजधर्म की टीस'

चित्र
                                                   ये कौन सा राजधर्म है जो हमेशा समझाया जाता रहा कभी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री रहे नरेन्द्र मोदी को तो कभी मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह को,  हाँ  ये और बात है की नरेन्द्र मोदी को राजधर्म उन्ही पार्टी के नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री ' अटल बिहारी वाजपेयी' ने याद दिलाई थी और अमित शाह को ये राजधर्म विपक्ष के नेता सोनिया और मनमोहन याद दिला रहे है... तो क्या हम मान ले कि गुजरात दंगो के बाद जिस जगह पर मोदी खड़े थे लगभग उसी जगह के आसपास आज शाह है क्योंकि अगर एक बार को विपक्ष के आरोप को नज़रअंदाज़ कर दे तो भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की दिल्ली हिंसा में पुलिस की निष्क्रियता रही है और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इसके लिए पुलिस को फटकार भी लगा चुके है... इसके अलावा इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता की जिस हिंसा की शुरुआत रविवार से ही हो गयी थी उस पर संज्ञान अमित शा...