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राजनीति vs राजधर्म

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राजनीति में कभी-कभी ऐसा समय आता है जब ये लगता है कि किसी राजनेता के लिए राजधर्म ज्यादा मायने रखता है या राजनीति, आज हमारे पास इसके दो उदाहरण या यूं कहे कि मुख्यमंत्री है जिनमें से एक ने राजधर्म को अहमियत दी तो दूसरे ने राजनीति को, सबसे पहले बात करेंगे सीएम योगी आदित्यनाथ की जिनके पिता के मृत्यू हो जाने पर भी वो राजधर्म नहीं भूले, पिता की मृत्यू का समाचार एक ऐसा समय होता है जो किसी भी पुत्र के लिए उसके भावनाओँ के सागर को तोड़ दे लेकिन सीएम ने इस समाचार को पाकर भी अपने कर्तव्य का वहन किया क्योंकि जब उनको ये समाचार मिला था तब वो कोरोना मालले पर टीम 11 के मीटिंग में व्यस्त थे , उन्होंने बिना विचलित हुए उस मीटिंग को पूरी किया फिर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पिता के लिए एक खत लिखा , जिसमें उन्होंने लिखा कि पिताजी के कैलाशवासी होने पर मुझे भारी दुख और शोक है. वे मेरे पूर्वाश्रम के जन्मदाता हैं. जीवन में ईमानदारी , कठोर परिश्रम और नि:स्वार्थ भाव से लोक मंगल के लिए समर्पित भाव के साथ कार्य करने का संस्कार बचपन में उन्होंने मुझे दिया. अंतिम क्षणों में उनके दर्शन की हार्दिक इच्...

मजबूर कौन ?

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जब बीमारी शहर को बेगाना कर देती है तब वही शहर जो कभी उम्मीदों की रौशनी बिखेरता था एक पल में बेबसी का रेगिस्तान बन जाता है, और कुछ ऐसी ही बेबसी इन दिनों दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर देखने को मिला जहाँ प्रवासी मजदूर काम न होने , पैसे न होने और माकन मालिकों द्वारा बेदखल किये जाने पर भगवान भरोसे ही सड़क पर निकल गए, पहले 10 फिर 100 और फिर हज़ारों की संख्या में इनका रेला दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर होता चला गया, लेकिन क्या इस समय देश में बेबसी का यही एक चेहरा है सच पूछिए तो नहीं , अगर एक चेहरा मजदूरों की बेबसी है तो दूसरा चेहरा सरकार की बेबसी का है क्योंकि सरकार ये जानती है की कोरोना जैसी  बीमारी को भारत जैसे देश में रोकने के लिए लॉकडाउन  बेहद जरुरी है क्योंकि अगर हमारे देश में कोरोना स्टेज 3 में पहुंचा तो इस बीमारी को कंट्रोल में लाना यहाँ बहुत मुश्किल हो जायेगा और यही सोच कर सरकार ने फ़ौरन लॉकडाउन का रास्ता अपनाया अब ये सरकार की बेबसी नहीं तो और क्या है.... अब ज़रा इस बात को भी समझाना होगा की हम इस लॉकडाउन से कोरोना की चेन को तोर सकते है लेकिन मजदूरों के इसी रेले ने लॉकडाउन ...