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बेबसी

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अब हर ओर गूंजती सिसकिया है ,अपनों को ढूंढती नम नज़रे है , विध्वंश के बाद की दहशत है ,जल चुके आशियाने का दर्द है ,और इनसब के बीच एक बेबसी है, बेबसी एक माँ की जिसके सामने उसके जवान बेटे की हत्या हुई , बेबसी उन बच्चों की जो अपने आखों के सामने अनाथ हो गए, बेबसी उस पिता की जो अस्पताल में अपने बेटे की ज़िन्दगी के लिए मिन्नतें कर रहा है , बेबसी उस भाई की जो मोर्चरी के बहार आहे भर रहा है...इतना सब होने के बाद भी इसी राजधानी  दिल्ली में एक गलियारा एक दम सुरक्षित है और कमाल की बात तो ये है की इसी गलियारे से दंगे की ये आग भड़की थी, और वो गलियारा है सियासत का... हा लाँकि ये बेबसी कोई नई तो नहीं ये तो हमने पहले भी देखा है, तब दौर 2002 का था और राज्य गुजरात था,  तब करीब 2000 से ज्यादा लोगों की जान गयी थी जैसा की इस घटना के पीड़ितो ने बताया था, हाँ  सरकारी आकड़ें इससे अलग है क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक तो गुजरात दंगो में 1044 लोगों की मौत हुई थी जिसमें 790 मुस्लिम और 254 हिंन्दू थे, उस वक़्त भी ऐसी ही बेबसी थी, यही दहशत था ऐसे ही चीत्कारें थी, यही सिसकिया सालो...

'राजधर्म की टीस'

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                                                   ये कौन सा राजधर्म है जो हमेशा समझाया जाता रहा कभी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री रहे नरेन्द्र मोदी को तो कभी मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह को,  हाँ  ये और बात है की नरेन्द्र मोदी को राजधर्म उन्ही पार्टी के नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री ' अटल बिहारी वाजपेयी' ने याद दिलाई थी और अमित शाह को ये राजधर्म विपक्ष के नेता सोनिया और मनमोहन याद दिला रहे है... तो क्या हम मान ले कि गुजरात दंगो के बाद जिस जगह पर मोदी खड़े थे लगभग उसी जगह के आसपास आज शाह है क्योंकि अगर एक बार को विपक्ष के आरोप को नज़रअंदाज़ कर दे तो भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की दिल्ली हिंसा में पुलिस की निष्क्रियता रही है और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इसके लिए पुलिस को फटकार भी लगा चुके है... इसके अलावा इस बात को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता की जिस हिंसा की शुरुआत रविवार से ही हो गयी थी उस पर संज्ञान अमित शा...