बेबसी

अब हर ओर गूंजती सिसकिया है ,अपनों को ढूंढती नम नज़रे है , विध्वंश के बाद की दहशत है ,जल चुके आशियाने का दर्द है ,और इनसब के बीच एक बेबसी है, बेबसी एक माँ की जिसके सामने उसके जवान बेटे की हत्या हुई , बेबसी उन बच्चों की जो अपने आखों के सामने अनाथ हो गए, बेबसी उस पिता की जो अस्पताल में अपने बेटे की ज़िन्दगी के लिए मिन्नतें कर रहा है , बेबसी उस भाई की जो मोर्चरी के बहार आहे भर रहा है...इतना सब होने के बाद भी इसी राजधानी दिल्ली में एक गलियारा एक दम सुरक्षित है और कमाल की बात तो ये है की इसी गलियारे से दंगे की ये आग भड़की थी, और वो गलियारा है सियासत का... हा लाँकि ये बेबसी कोई नई तो नहीं ये तो हमने पहले भी देखा है, तब दौर 2002 का था और राज्य गुजरात था, तब करीब 2000 से ज्यादा लोगों की जान गयी थी जैसा की इस घटना के पीड़ितो ने बताया था, हाँ सरकारी आकड़ें इससे अलग है क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक तो गुजरात दंगो में 1044 लोगों की मौत हुई थी जिसमें 790 मुस्लिम और 254 हिंन्दू थे, उस वक़्त भी ऐसी ही बेबसी थी, यही दहशत था ऐसे ही चीत्कारें थी, यही सिसकिया सालो सुनाई दी थी, हाँ ये कहना गलत नहीं होगा की बेबसी तो उन आँखों में भी थी जो ज़िंदा बच गए थे, क्योंकि तिनका तिनका लगा कर बनाया गया आशियाना उनके आँखों के सामने जल गया,नौकरी व्यापार सब छिन गया,होंठो की मुश्कान हमेशा के लिए छिन गई....क्या हम फिर भी इन दंगों से सबक नहीं ले पाए जो हमने उसी समाज को जन्म दिया, उन सियासतदारों के मुहरे बने जिन्हे सिर्फ धर्म के आधार पर अपनी राजनितिक रोटियां सेकने से मतलब है , ज़रा सोचिये ये वहीं सियासतदार है जो लोगों को भड़का कर नफ़रत पैदा कर इस मुकाम पर लाकर ये खड़े कर देते है जहाँ आपके आस पास के ही रहने वाले लोग आपके जान के प्यासे हो जाये, जहाँ कुछ लोग आपको घेर कर आपसे आपका नाम आपका मजहब पूछे आप नहीं जानते की अगर आपने नाम बताया तो ये आपके मरने या जीने की वजह बन सकता है... फिर भी क्यों जन्म देते है उस समाज को जहाँ अंकित के घरवाले भी रो रहे है और फुकरान के घरवाले भी जहाँ रतनलाल की विधवा पत्नी भी रो रही है और इरफ़ान की माँ भी ,ये कैसी बेबसी है..

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