मजबूर कौन ?


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जब बीमारी शहर को बेगाना कर देती है तब वही शहर जो कभी उम्मीदों की रौशनी बिखेरता था एक पल में बेबसी का रेगिस्तान बन जाता है, और कुछ ऐसी ही बेबसी इन दिनों दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर देखने को मिला जहाँ प्रवासी मजदूर काम न होने , पैसे न होने और माकन मालिकों द्वारा बेदखल किये जाने पर भगवान भरोसे ही सड़क पर निकल गए, पहले 10 फिर 100 और फिर हज़ारों की संख्या में इनका रेला दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर होता चला गया, लेकिन क्या इस समय देश में बेबसी का यही एक चेहरा है सच पूछिए तो नहीं , अगर एक चेहरा मजदूरों की बेबसी है तो दूसरा चेहरा सरकार की बेबसी का है क्योंकि सरकार ये जानती है की कोरोना जैसी  बीमारी को भारत जैसे देश में रोकने के लिए लॉकडाउन  बेहद जरुरी है क्योंकि अगर हमारे देश में कोरोना स्टेज 3 में पहुंचा तो इस बीमारी को कंट्रोल में लाना यहाँ बहुत मुश्किल हो जायेगा और यही सोच कर सरकार ने फ़ौरन लॉकडाउन का रास्ता अपनाया अब ये सरकार की बेबसी नहीं तो और क्या है.... अब ज़रा इस बात को भी समझाना होगा की हम इस लॉकडाउन से कोरोना की चेन को तोर सकते है लेकिन मजदूरों के इसी रेले ने लॉकडाउन का ब्रेकडाउन कर दिया क्योंकि अब अगर इनमे से किसी भी मजदूर को ये बीमारी होगी तो वो  अपने साथ साथ पूरे गांव को इस घातक बीमारी से संक्रमित कर देगा अगर ऐसा हुआ तो भारत तीसरे स्टेज में पहुंच जायेगा और हालत ज्यादा ख़राब हो जायेंगे,
अब एक बार और गौर से देखिये इस तस्वीर को और सोचिये की कौन-कौन ज्यादा मजबूर है ,
एक बच्ची जो ये कहती है की माँ अब मैं नहीं चल सकती 
एक पिता जो ये कहता है की मेरे बच्चो ने कई दिनों से कुछ नहीं खाया 
वो भीड़ जो भेड़-बकरियों की तरह बसों में ठूंसे जा रहे है 
वो देश जो घातक बीमारी से लड़ रहा है 
या वो प्रधानमंत्री जो ऐसी प्रास्थिति के लिए देश से माफ़ी मांग रहा है 
































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