राजनीति vs राजधर्म


राजनीति में कभी-कभी ऐसा समय आता है जब ये लगता है कि किसी राजनेता के लिए राजधर्म ज्यादा मायने रखता है या राजनीति, आज हमारे पास इसके दो उदाहरण या यूं कहे कि मुख्यमंत्री है जिनमें से एक ने राजधर्म को अहमियत दी तो दूसरे ने राजनीति को, सबसे पहले बात करेंगे सीएम योगी आदित्यनाथ की जिनके पिता के मृत्यू हो जाने पर भी वो राजधर्म नहीं भूले, पिता की मृत्यू का समाचार एक ऐसा समय होता है जो किसी भी पुत्र के लिए उसके भावनाओँ के सागर को तोड़ दे लेकिन सीएम ने इस समाचार को पाकर भी अपने कर्तव्य का वहन किया क्योंकि जब उनको ये समाचार मिला था तब वो कोरोना मालले पर टीम 11 के मीटिंग में व्यस्त थे , उन्होंने बिना विचलित हुए उस मीटिंग को पूरी किया फिर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पिता के लिए एक खत लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा कि पिताजी के कैलाशवासी होने पर मुझे भारी दुख और शोक है. वे मेरे पूर्वाश्रम के जन्मदाता हैं. जीवन में ईमानदारी, कठोर परिश्रम और नि:स्वार्थ भाव से लोक मंगल के लिए समर्पित भाव के साथ कार्य करने का संस्कार बचपन में उन्होंने मुझे दिया. अंतिम क्षणों में उनके दर्शन की हार्दिक इच्छा थी.लेकिन वे अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होंगे. मुख्यमंत्री ने इसका कारण भी बताया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन हटने के बाद ही वे घर जा पाएंगे....ये है राजधर्म को निभाने वाले राजनेता अब दूसरा उदाहरण आपको देते है ऐसे सीएम कि जिसने राजधर्म से ऊपर राजनीति को रखा वो है सीएम उद्धव ठाकरे, महाराष्ट्र में लॉकडाउन है इसके बाबजूद महाराष्ट्र के पालघर में भीड़ इकट्ठा होती है और चोरी के शक में दो साधुओं और उनके एक ड्राइवर की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है , और सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो ये थी कि जब भीड़ उन साधुओं को पीट रही थी तब पुलिस भी वही मौजूद थी अब जब ये शर्मनाक घटना एक ऐसे मुख्यमंत्री के राज्य में हुई जो हिंदुत्व के एक बड़े चेहरे के नाम से जाना जाता है, तो सरकार का निशाने पर आना तो तय था लेकिन क्या परिस्थिति वस उद्धव ठाकरे का हिदुत्व भी मिलावटी हो चुका है जो उनके राज्य में साधू ही सुरक्षित नहीं हालांकि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इस मसले पर सरकार का रुख सभी के सामने रखा. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि उनकी सरकार किसी भी दोषी को नहीं छोड़ेगी, लोग इस मसले को भड़काने की कोशिश ना करें, लेकिन फिर भी ये कहना गलत नहीं होगा कि कई बार राजनीति ने राजधर्म पर भारी पड़ जाती है

 


टिप्पणियाँ

  1. बहुत तार्किक रूप से योगी जी और उद्धव ठाकरे जी की कार्यशैली,व्यक्तित्व और सोच का अंतर स्पष्ट किया है आपने स्मिता जी।आपकी विचारात्मक प्रतिभा को सलाम🙏

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मजबूर कौन ?

इंतज़ार